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रावत समाज एक ऐतिहासिक और पराक्रमी समुदाय है, जो मुख्य रूप से राजस्थान और उत्तराखंड में पाया जाता है। यह समाज वीरता, गौरवशाली इतिहास और रक्षक परंपरा के लिए जाना जाता है।
‘रावत’ शब्द का अर्थ “वीर योद्धा” या “तलवार के धनी” माना जाता है। यह उपाधि प्राचीन काल में युद्ध में वीरता दिखाने वाले राजपूत और अन्य योद्धा समुदायों को सम्मान स्वरूप दी जाती थी।
रावत समाज का संबंध प्राचीन राजपूत वंशों जैसे चौहान, गहलोत, सिसोदिया आदि से जोड़ा जाता है। यह समाज सदैव अपनी मातृभूमि की रक्षा और सम्मान के लिए प्रसिद्ध रहा है।
राजस्थान के मेरवाड़ा (अजमेर) क्षेत्र में रावत राजपूतों का विशेष प्रभाव रहा है। इन योद्धाओं ने अपनी वीरता और संघर्षों के माध्यम से समाज की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उत्तराखंड (गढ़वाल और कुमाऊं) क्षेत्र में रावत उपनाम वाले लोग बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। यहां इन्हें स्थानीय शासक, थोकदार और सम्मानित परिवारों के रूप में जाना जाता है।
‘रावत’ उपनाम केवल राजपूत समाज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अहीर (यादव), जाट, गुर्जर और ब्राह्मण समुदायों में भी एक सम्मानसूचक पदवी के रूप में प्रयोग किया जाता है।
रावत समाज में विभिन्न गोत्र पाए जाते हैं, जिनमें गौदात, भूण्डक, विहलात, महेन्द्रात आदि प्रमुख हैं। यह समाज सूर्य, शिव और माँ दुर्गा का उपासक माना जाता है और वीरता के लिए प्रसिद्ध है।